ग्लिम्पसेज ऑफ हिस्ट्री एंड आर्कियोलॉजी: काफी मशहूर था टिकारी राज का दशहरा
मां दुर्गा के दर्शन के लिए आने वाले विदेशी मेहमानों को राज के बने विशेष अतिथिशाला में ठहराया जाता और उन्हें उचित सम्मान दिया जाता था। उस अतिथि शाला के जीर्ण अवशेष अभी भी हैं। प्रजा महाराजा कैप्टन गोपाल शरण को भगवान समझती थी। वह दयालु भी काफी थे और गरीबों की मालगुजारी माफ कर देते थे। जो भी उनके पास सहयोग के लिए आता, उसे वे भरपूर सहयोग देते थे।

टिकारी राज का दशहरा प्राचीन जमाने से ही काफी मशहूर था। किंतु,टिकारी राज के अंतिम महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह के जमाने में इसकी प्रसिद्धि चरम पर थी। उन दिनों दूर-दूर से लोग यहां दशहरा देखने के लिए आते थे। दूर्ग के सात आने महल में मीना बाजार सजती थी,जहां देश-विदेश से बडे़-बडे़ व्यापारी सोने-चांदी के आभूषणों और अन्य बहुमूल्य खुबसूरत सामग्रियों से मीना बाजार को मोहक बना देते थे। राजे-महाराजे मीना बाजार का आनंद उठाते और मनमोहक सामग्रियों को क्रय कर अपने साथ ले जाते।
आम पब्लिक को महाराजा के दर्शन के लिए दशहरा के अवसर पर ही महल में प्रवेश करने की छूट होती थी। महाराजा टिकारी राज के स्वर्ण जड़ित सिंहासन पर बैठकर लोगों को दर्शन देते और उन्हें आशीर्वाद तथा उपहार एवं मिठाइयां देकर विदा करते। संपूर्ण राजमहल अपनी स्थापित बिजली घर से आलोकित रहती। सड़क के दोनों ओर आकर्षक लैम्प पोस्ट से सड़कें आलोकित रहती।
इस मौके पर महीने भर राज-दरबार और राजमहल आकर्षक रूप से सजा होता और किले के मैदानों में नाच-तमाशे एवं नर्तकियों के नाच से संपूर्ण राजमहल गुंजायमान रहता। एक से एक देशी-विदेशी मेहमान समारोह का भरपूर आनंद उठाते थे। अंतिम विजयदशमी के दिन के शाही जुलूस को देखने के लिए भारी भीड़ उमड़ती। यह शाही दृश्य दर्शकों को विशेष आकर्षण का केंद्र बनता। इसे देख दर्शकों की सांसें थम जाती,क्योंकि इस दिन पूरे देश और विदेशों से कलाकारें आकर अपना कला प्रस्तुत करती। राजा मुक्त हस्त से उन्हें उपहार देकर विदा करते। कलाकार उपहार पाकर अपने को धन्य समझते।
मां दुर्गा के दर्शन के लिए आने वाले विदेशी मेहमानों को राज के बने विशेष अतिथिशाला में ठहराया जाता और उन्हें उचित सम्मान दिया जाता था। उस अतिथि शाला के जीर्ण अवशेष अभी भी हैं। प्रजा महाराजा कैप्टन गोपाल शरण को भगवान समझती थी। वह दयालु भी काफी थे और गरीबों की मालगुजारी माफ कर देते थे। जो भी उनके पास सहयोग के लिए आता, उसे वे भरपूर सहयोग देते थे। जमींदारी समाप्त होने तक वे टिकारी राज के महाराजा बन रहे। टिकारी राज का राजमहल और कैमूर का राजमहल ये दो ही बिहार के फोर्ट के रूप में गिनती में थी।
यूं तो इस राज का वास्तविक संस्थापक उनके पूर्वज उत्तर प्रदेश से गया जी में पिंडदान करने आए धीर सिंह अथवा वीर सिंह को जाता है। किंतु बाद में लाव में जन्मे सुंदर सिंह को विशेष रूप में माना जाता है। सुंदर सिंह एक बहादुर राजा के रूप में उभरे। इस राज में कई रानियां भी राज की उच्च कोटि की निकलीं, जिसमें इंद्रजीत कुंअर, राजरूप कुंअर और रामेश्वरी कुंअर आदि का नाम प्रतापी महारानी के रूप में जानी जाती है। इन लोगों ने धार्मिक, शैक्षणिक और जन उपयोगी कार्य अनेक किये, जिससे टिकारी राज में उज्वल कृतिमान स्थापित हुए।
टिकारी राज के इतिहास में महाराजा कैप्टन गोपाल शरण सिंह का नाम विशेष उल्लेखनीय है। प्रजा उन्हें भगवान समझती थी। ब्रिटिश सरकार ने उन्हें कैप्टन की उपाधि से सम्मानित किया था। जमींदारी उन्मूलन होने तक वे टिकारी राज के वे राजा बने रहे। लगभग 150 वर्षों तक वे टिकारी राज के राजा के रूप में कार्य भार को संभाला। टिकारी राज का किला महाभारत काल से लेकर अब तक के अवशेषों का साक्षी बना हुआ है। यहां मौर्य, मौखरी और मुगल शासको ने भी अपना शासन चलाया।
ग्लिम्पसेज ऑफ हिस्ट्री एंड आर्कियोलॉजी के अनुसार, टिकारी शहर के पश्चिम नॉर्दर्न-ब्लैक पॉलिश-वेयर काल के प्राचीन टीले पर बसा है। यहां से बड़ी संख्या में ग्रे-वेयर और ब्लैक-वेयर काल के बहुमूल्य अवशेष पाए गए हैं। इतना ही नहीं यहां से पंचमार्क सिक्के भी प्राप्त हुए हैं। वर्तमान किला मुगल शैली में औदक दुर्ग के भग्नावशेषों पर लाखौरी ईंटों से बना है,जो पांच तलों में वामन आंगनों का यह किला स्थापत्य कला का अनुपम उदाहरण है।
यह किला चारों तरफ से सुरक्षात्मक गहरी खाइयों से घिरा है, जिसमें प्राचीन जमाने में ओपन कास्ट सिस्टम के पूल बने थे। इसीसे होकर राजा, प्रजा और सेनाएं जाती थी। नौ आने के मुख्य द्वार पर नौ हाथ का बंगाल टाइगर गर्जना करता था। वहीं अन्य व्यग्र शाला में बाघें गर्जना करती थी। साथ ही हस्ती शाला में विशाल हाथियां, अश्वशाला में प्रशिक्षित सैन्य अश्व, उष्ट्रशाला में ऊंटें और बड़ी मात्रा में फ़ौजों को रहने के लिए अंडरग्राउंड सुरक्षात्मक सैन्य शाला से राजमहल सज्जित था।
विजयादशमी के दिन जब राजा सुसज्जित रथ पर नौ आने के महल से सुरक्षा प्रहरी के साथ निकलते तो उनके आगे मां दुर्गा की प्रतिमा सात आने महल से निकल कर चलती। सबसे आगे आवाज करने वाली बंदूकों जत्था चलता और उसके पीछे सज्जित हाथियों पर अन्य मेहमान लोग, ऊंटों पर नगाडा़ बजाते नगड़ची तथा घोड़े पर सवार सैन्य की टुकड़ी शोभायमान होती। टिकारी राज का सारा वातावरण आनंदमय हो उठता और लोग खुशी में झूम उठते।

Guest Author
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद


