धर्म और अभिलेखों के आईने में गया-बोधगया
वर्तमान काल में मगध का क्षेत्र सिमट कर मात्र अब एक प्रमंडल के रूप में बचा है, जिसमें गया, जहानाबाद, नवादा, औरंगाबाद और अरवल जिले शामिल हैं। इन जिलों में आज भी कई अज्ञात, विस्मृत एवं उपेक्षित बड़ी संख्या में बौद्ध स्थल विद्यमान हैं, जो ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक तथा पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं।

अभिलेखीय आईने में गया तथा बोधगया का ऐतिहासिक अभिलेख अशोक के जमाने से प्राप्त होता है। अशोक के अभिलेख में कहा गया है कि उसने अपने राज्याभिषेक के 10 वर्षों के बाद "संबोधि" का भ्रमण किया था, जो कि बौद्ध दर्शनावलंबियों का एक अति पवित्र स्थल था।
बिहार की जननी "गया" को 22 मार्च 1912 को अधिसूचना जारी कर 'बिहार' राज्य के नाम से अभिहित किया गया। इस राज्य के प्रथम राज्यपाल "सर-चार्ल्स-स्टूअर्ट" "बेली" बने। किन्तु राज्य का काम-काज 1 अप्रैल 1912 से आरंभ किया गया। सन् 1757 से 2 अक्टूबर 1865 तक यह एक लंबे कालखंड के लिए जिला के रूप में ही "बिहार" नाम से प्रसिद्ध रहा। फिर 1787 ईस्वी में इसे पूर्ण "जिला" का दर्जा मिला। तब बिहार जिले का कलेक्टर "थामस-ला" बनाये गये। तब उन दिनों इस नए बनाए गए 'बिहार' जिला में आज का गया, जहानाबाद, औरंगाबाद, नवादा, अरवल, नालंदा और पटना को शामिल किया गया, किन्तु मुख्यालय "गया" को बनाया गया।
फिर बदलते प्रशासनिक व्यवस्था के अनुसार 3 अक्टूबर 1865 को इस शहर का नाम बिहार से बदलकर "गया" कर दिया गया और इसे पूर्ण जिला का दर्जा दिया गया। पूर्व के"थामस-ला" को ही गया का प्रथम कलेक्टर नियुक्त किया गया । आज बिहार राज्य का यह गया नगर विश्व के प्राचीनतम नगरों में एक माना जाता है।
पूर्व के 'ऋग-वैदिक' काल में यह प्रदेश "किकट" के नाम से जाना जाता था। यह प्रदेश विंध्य श्रेणी पर्वत माला श्रृंखला से जुड़े लिलाजन नदी के संगम पर पावन फल्गु नदी के तट पर स्थित अति प्राचीन ऐतिहासिक, धार्मिक तथा पुरातात्त्विक एवं सांस्कृतिक नगरी के रुप मे विश्व विख्यात है।
सनातन धर्मावलंबियों के लिए तो यह स्थल स्वर्ग के समान है,जहां से प्राणी को पिंडदान और तर्पण के माध्यम से"मोक्ष" की प्राप्ति होती है।
वहीं बौद्ध धर्मावलंबियों के लिए यह भूमि "ज्ञान-भूमि" के रूप में पूजित, पवित्र और धार्मिक स्थल के रूप में "बोधगया" के नाम से विश्व प्रसिद्ध है तथा पूरे विश्व में यह "बुद्ध-दर्शन" का मुख्य पवित्र केंद्र बना हुआ है। इतना ही नहीं चूंकि 'प्राचीन-गया' कई धर्मों का संगम स्थल है, अतः वर्तमान में यह विश्व के लोगों के लिए मुख्य पर्यटन का केंद्र बना हुआ है।
अभिलेखीय आईने में गया तथा बोधगया का ऐतिहासिक अभिलेख अशोक के जमाने से प्राप्त होता है। अशोक के अभिलेख में कहा गया है कि उसने अपने राज्याभिषेक के 10 वर्षों के बाद "संबोधि" का भ्रमण किया था, जो कि बौद्ध दर्शनावलंबियों का एक अति पवित्र स्थल था।
बोधगया उन दिनों "संबोधि" के नाम से जाना जाता था। बोधगया के अलावे गया तथा वर्तमान जहानाबाद जिले के बराबर और नागार्जुन पहाड़ियों में मौर्यकालीन अभिलेखों की प्राप्ति हुई है। ऐसे अभिलेखों की कुल संख्या 7 हैं। इन अभिलेखों में अशोक तथा उनका पौत्र दशरथ द्वारा आजीवक संप्रदाय को दान में दिए गए गुफाओं के बारे में चर्चा की गई है।
आजीवक संप्रदाय की उत्पत्ति एक प्रतिक्रियावादी संप्रदाय के रूप में परंपरावादी ब्राह्मणवादी कर्मकांडों के विरोध स्वरूप छठी शताब्दी ईसा पूर्व में मानी गई है। यह अभिलेख तीसरी शताब्दी ईसा पूर्व की है। यूं तो मगध क्षेत्र का इतिहास एवं सांस्कृतिक परंपराएं मानव सभ्यता के प्रारंभिक काल से ही आरंभ मानी गई है। परंतु,इस साम्राज्य की स्थापना का मुख्य श्रेय चंद्रगुप्त मौर्य को जाता है। उन्होंने अपने गुरु चाणक्य की सहायता से अपने साम्राज्य का विस्तार और विकास किया। उसने पश्चिमोत्तर भारत के यूनानी शासक सेल्यूकस निकेटर को पराजित कर कंधार, काबुल, हेरात और जेडोसिया के भू भागों को जीतकर अपने कब्जे में कर लिया। बाद में सेल्युकस ने अपनी पुत्री "हेलेना" का विवाह चंद्रगुप्त मौर्य से करके संधी कर ली और दहेज में पूर्व के चारों प्रदेशों को भी दे दिया।
कहा जाता है कि मौर्य चन्द्रगुप्त ने भी सेल्यूकस को 500 हाथी भेंट में दी थी। इस प्रकार उसका साम्राज्य बिहार सहित गंगा-जमुना के क्षेत्र, पंजाब, बलूचिस्तान, कंधार, काबुल हेरात, गुजरात, कश्मीर, बंगाल तथा विंध्य के क्षेत्र तक शामिल हो गए थे। फिर उनकी मृत्यु पर उनके उत्तराधिकारी बिंदुसार और उनकी मृत्यु के बाद सम्राट अशोक गद्दी पर बैठे। कलिंग विजय के भयंकर रक्तपात से विचलित होकर सम्राट अशोक ने "बौद्ध धर्म" को अपना लिया था और उन्होंने युद्ध की जगह शांति का संदेश और मैत्री के जरिए "धम्म-विजय' की स्थापना की थी। बृहत्तर भारत का स्वरूप सम्राट अशोक के काल में ही हम पाते हैं।
पूर्व में मगध की राजधानी पाटलिपुत्र,पटना, कुसुमपुर, पुष्पपुर, पाटली, पाटली ग्राम, पादली पुरा,पादली पाटलीबोथरा आदि नामों से जाना गया है।बौद्ध काल में प्रसिद्ध 16 महाजनपदों में मगध महाजनपद अति विशाल प्रसिद्ध और तथागत का अति प्रिय जनपद था। यही कारण है कि इस काल में बौद्ध काल के विशाल अवशेष पाए जाते हैं। उनमें मुख्य रूप से मैनौती-स्तूपें, बौद्ध मूर्तियां, शैल चित्र, मंदिर, मठ, महाविहार और चैत्य आदि प्रमुख हैं।
वर्तमान काल में मगध का क्षेत्र सिमट कर मात्र अब एक प्रमंडल के रूप में बचा है, जिसमें गया, जहानाबाद, नवादा, औरंगाबाद और अरवल जिले शामिल हैं। इन जिलों में आज भी कई अज्ञात, विस्मृत एवं उपेक्षित बड़ी संख्या में बौद्ध स्थल विद्यमान हैं, जो ऐतिहासिक, धार्मिक, पुरातात्विक तथा पर्यटन की दृष्टि से अति महत्वपूर्ण हैं। ईसापूर्व छठी शताब्दी में एक महान् पुरुष ने जन्म लिया और जिन्होंने स्वयं "सम्यक-संबुद्ध" बनकर दुखों से लोगों को मुक्ति का मार्ग दिखलाया,वे थे गौतमी पुत्र "सिद्धार्थ गौतम"।
गौतम बुद्ध का जन्म ईसा पूर्व छठी शताब्दी 563 में वैशाख पूर्णिमा के दिन कौशल जनपद में कपिलवस्तु नामक गणराज्य के लुंबिनी नामक उद्यान में दो शाल वृक्षों के नीचे हुआ था। उनकी माता महामाया रुमनदेई तथा पिता शुद्धोधन थे। सिद्धार्थ गौतम के बचपन का नाम प्राचीन इतिहास के ग्रंथों में नहीं मिलता। माना जाता है कि इसे बाद में जोड़ दिया गया है। 1898 ई. के जनवरी माह में "पिपरहवा" जहां उन दिनों "विलियम पेपे" की जमींदारी थी, वहां प्राप्त बड़े पुरातात्विक टीले की खुदाई में पांच उत्कृष्ट मंजूषे में महात्मा बुद्ध के अवशेष के "कलश" मिले थे,जिसमें एक कलश पर प्राकृत भाषा धम्म लिपि में अभिलेख अंकित थे।
उसमें लिखा था--"सुकिति भतिन सभगिनिकन सपुत दलन इयसलिल निधने बुधस भगवते सकिन।"अर्थात्-- सुकिति यानी बुद्ध,भतिन स - भाइयों, बहिनी-बहनों, पुत्र का समुह, यह शरीर शाक्य-बुद्ध, भगवत यानी भगवान का स्थापित है।" इससे यह स्पष्ट होता है कि सिद्धार्थ गौतम के बचपन का नाम "सुकिति" रहा होगा। इस बात की चर्चा- 'डी. डी.कौशांबी' ने अपनी पुस्तक"ऐन्सियेंट हिस्ट्री"राज कमल प्रकाशन, इलाहाबाद में किया है।

Guest Author
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद


