विकास की राह देख रही बिहार की उपेक्षित धरोहरें
बिहार की अनेक ऐतिहासिक इमारतें, पुरातात्त्विक स्थल, प्राचीन मंदिर, किले और लोक-सांस्कृतिक परंपराएँ समुचित संरक्षण की अपेक्षा रखती हैं। कई स्थानों पर जन-जागरूकता का अभाव, अतिक्रमण, रखरखाव की कमी तथा ऐतिहासिक महत्व के प्रति उदासीनता गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं।
बिहार केवल एक भौगोलिक प्रदेश नहीं, बल्कि भारत की सभ्यतागत चेतना, ज्ञान-परंपरा, सांस्कृतिक विविधता और ऐतिहासिक गौरव का जीवंत प्रतीक है। इसी धरती पर ज्ञान की ज्योति प्रज्वलित हुई, लोकतंत्र के प्रारंभिक प्रयोगों ने आकार लिया, धर्म और दर्शन की अनेक धाराएँ विकसित हुईं तथा शिक्षा ने विश्वव्यापी पहचान प्राप्त की। नालंदा, विक्रमशिला, वैशाली, बोधगया और राजगीर जैसी ऐतिहासिक धरोहरें बिहार की पहचान को वैश्विक प्रतिष्ठा प्रदान करती हैं। नालंदा का ज्ञान, वैशाली की गणतांत्रिक चेतना, बोधगया की आध्यात्मिकता और लोकसंस्कृति की जीवंतता आज भी समाज को दिशा देने की क्षमता रखती है। इतिहास का गौरव तभी सार्थक होता है, जब वर्तमान पीढ़ी उसकी रक्षा करने के प्रति सजग हो।
बिहार की अनेक ऐतिहासिक इमारतें, पुरातात्त्विक स्थल, प्राचीन मंदिर, किले और लोक-सांस्कृतिक परंपराएँ समुचित संरक्षण की अपेक्षा रखती हैं। कई स्थानों पर जन-जागरूकता का अभाव, अतिक्रमण, रखरखाव की कमी तथा ऐतिहासिक महत्व के प्रति उदासीनता गंभीर चुनौतियाँ प्रस्तुत करती हैं। इसके अतिरिक्त, धरोहर संरक्षण को केवल सरकारी विभागों की जिम्मेदारी मान लेना भी उचित नहीं है। स्थानीय समुदायों, शिक्षण संस्थानों, इतिहासकारों, सामाजिक संगठनों और नागरिकों की सक्रिय भागीदारी आवश्यक है। यदि विकास योजनाओं में विरासत की अनदेखी की जाती है, तो भौतिक प्रगति के बावजूद समाज अपनी सांस्कृतिक पहचान का एक महत्वपूर्ण हिस्सा खो सकता है।
पार्ट-प्रथम : "गया जिला"
- शेरघाटी
गया जिला अंतर्गत शेरघाटी अनुमंडल का शेरघाटी मुख्यालय और इसके आसपास के क्षेत्र प्राचीन जमाने में जौनपुर के पठान राजाओं की हुकूमत अंतर्गत शामिल थे। शहर के पूर्वी छोर पर बूढ़-नदी के किनारे एक विशाल गढ़ था, जो करीब 20 एकड़ में फैला था। उसके अवशेष अभी दृष्टिगोचर होते हैं। शेरघाटी के दक्षिण में बुद्ध मठ के पास "बौद्ध-स्तूप" के संकेत मिलते हैं, जहां बौद्ध मूर्तियां बिखरी पड़ी मिली हैं। इसके पश्चिमी भाग में मोरहर नदी के किनारे प्राचीन "जेल" की सुंदर ऐतिहासिक चहारदिवारियां थी,जो अब विध्वंस हो चुकी हैं। इसी के निकट ऐतिहासिक दर्शनीय दो मंजिला "अशोक कूप" थी, जिसके चारों ओर बरामदे और कोठरियां बनी हुई थी। वह 1967 ईस्वी के भीषण बाढ़ में " नदी में विलीन हो गई।
- गुरुआ
गुरुआ एक प्राचीन तथा पुरातात्विक एवं ऐतिहासिक स्थल है। यहां 5 एकड़ में फैला और करीब 20 फीट ऊंचे एक गढ़ के अवशेष पाए गए हैं,जिसमें से लाल मृदभांड तथा उत्तरी-काली-चमकीली मृदभांड, एनबीपी के बर्तन और अंदर की ओर मुड़ी मृदभांड तथा सीधी किनारे की थालियां मिली हैं। मृदभांडों पर विभिन्न प्रकार के रेखाचित्र भी चित्रित पाई गई हैं। यह प्राचीन ऐतिहासिक स्थल एक जमाने में प्रसिद्ध "बौद्ध -स्थल" के रूप में विकसित था, जहां भगवान बुद्ध पधारे थे। यहां "गुरु"आये, इस कारण इस स्थल का नाम "गुरुआ" पड़ा।
- गुणेरी
यह एक प्राचीन ऐतिहासिक स्थल है, जिसे सर्वप्रथम पुराविद् मेजर "किट्टो" ने इसे खोजा था। तब उन्होंने इसे एक विशाल नगर और बौद्ध विहारों के अवशेषों के रूप में पाया धा। तब उन्होंने इसे "गुनेरिया" नामक स्थल के रूप में चिन्हित किया था। इस ऐतिहासिक स्थल को 1872-73 ईस्वी में जब पुराविद् "वेगलर" ने खोज की तब यह ऐतिहासिक स्थल प्राचीन जमाने में एक प्रमुख बौद्ध केंद्र के रूप में विकसित और यह प्रसिद्ध स्थल बौद्ध ग्रंथ "बुद्ध नामा" के अनुसार "गुणतेरी" के नाम से प्रसिद्ध था।
मान्यता है कि गौतम बुद्ध "बुद्धगया" यानी "बोधगया" से ज्ञान-प्राप्ति के बाद मृगडाव यानी सारनाथ की ओर जाने के क्रम में उन्होंने यहां रात्रि विश्राम किया था। यहां भगवान बुद्ध की एक विशाल मूर्ति भूमि-स्पर्श मुद्रा में स्थापित है। अन्य अभिलेखों के अनुसार इस स्थल का नाम "श्री गुणचरित्" के रूप में भी मिलता है। पुरातत्व विभाग ने इसे सुरक्षित,संरक्षित तथा विकसित किया है। यहां शिव, दुर्गा तथा बुद्ध की अनेक प्रतिमाएं मिली हैं। एक स्त्री की प्रतिमा मिली है, जिसके बायें हाथ में अर्ध विकसित कमल का फूल तथा दाहिना हाथ वरद मुद्रा में है। "पद्मासन" की मुद्रा में एक अन्य "बुद्ध" की आकर्षक प्रतिमा है, जिसके बने कमल-दल पर सात पंक्तियों में अभिलेख उत्कीर्ण है। इससे पता चलता है कि इस पवित्र धार्मिक स्थल को महेंद्र पाल ने इसे वैशाख शुक्ल पंचमी के दिन "गुनचरित" 'विहार' के रूप में स्थापित किया था।
- मण्डा-पहाड़
गुरुआ के "मंडा" पहाड़ को प्रसिद्ध पुराविद् मेजर किट्टो ने खोजा था, जो एक प्राचीन प्रसिद्ध बौद्ध स्थल के रूप में प्रसिद्ध था। इस ऐतिहासिक पहाड़ के चारों तरफ विस्तृत क्षेत्र में महाविहारों के विस्तृत अवशेष पाए गए हैं। साथ ही मृदभांडों के अवशेषों एवं ईट के बिखरे टुकड़ों से यह क्षेत्र भरा पड़ा है। पहाड़ के पूरब में लगभग 50-60 एकड़ भूमि में फैले गढ़ के अवशेष पाए जाते हैं, जहां मृदभांडों के बने बर्तन, थालियां,उन्नतोदर कटोरे, ढक्कन, अलंकृत बर्तनें जिन पर धारियां, रेखाएं, बिंदु समूह, वृत्त आदि चित्रित मिलते हैं। भगवान बुद्ध की खंडित प्रतिमाओं के ढेर सारे मिलते हैं,जो तथागत के महाभिनिष्क्रमण से लेकर महा परिनिर्वाण तक की घटनाओं से संबंधित मूर्तियों के अवशेष पाए गए हैं। यहां एक बड़ी गौतम बुद्ध की अति आकर्षक प्रतिमा पहाड़ के ऊपर थी, जो अभी पटना-संग्रहालय की शोभा बढ़ा रही है। वहीं अभी भी पहाड़ के नीचली सतह पर बुद्ध की एक बड़ी प्रतिमा पूजित विद्यमान है। आवश्यकता है इसे गहन सर्वेक्षण, संरक्षण और उत्खनन कर विकसित करने की। जिससे कि यह ऐतिहासिक, धार्मिक तथा पुरातत्विक एवं सांस्कृतिक स्थल पर्यटन की दृष्टि से महत्वपूर्ण बन सके।
बिहार की धरोहरें उसके गौरवशाली अतीत की स्मृतियाँ भर नहीं हैं; वे भविष्य के निर्माण की संभावनाओं का भी उद्घाटन करती हैं। आवश्यकता इस बात की है कि बिहार अपनी विरासत को केवल उत्सवों और स्मृति-दिवसों तक सीमित न रखे, बल्कि उसे शिक्षा, पर्यटन, रोजगार, सामाजिक समरसता और सांस्कृतिक पुनर्जागरण से जोड़े। सरकार नीतिगत प्रतिबद्धता दिखाए, समाज अपनी जिम्मेदारी समझे और युवा पीढ़ी संरक्षण का संकल्प ले, तभी यह धरोहर आने वाली पीढ़ियों तक सुरक्षित पहुँच सकेगी।

Guest Author
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद



