शारदीय नवरात्रि : आस्था, पवित्रता और दैवीय अनुभूति का पर्व
शारदीय नवरात्रि में मां दुर्गा को इनकी नौ रूपों, प्रथम "शैलपुत्री" से "सिद्धिदात्री" तक के अलग-अलग स्वरूपों में पूजा-अर्चना और आरती कर, अष्टमी और नवमी तिथि को हवन, संध्या-आरती और कन्या पूजन के साथ इन्हें विदाई देने का विधान है।

शारदीय नवरात्रि जो दुर्गा पूजा और दशहरा के नाम से ज्यादा प्रसिद्ध है,इसकी शुरुआत महालया के दिन से होती है। इसे "मां दुर्गा केआगमन" की तिथि मानी जाती है। इस दिन 'मां दुर्गा देवी' का पहला स्वरूप "मां शैलपुत्री" के रूप में उनकी पूजा की जाती है। यह पर्व इस वर्ष 11 अक्टूबर 2026 से आरंभ होकर 20 अक्टूबर 2026 तक चलेगा।
महालया के दिन से देवी पक्ष की चूंकि शुरुआत होती है,इस कारण इस वर्ष 11 अक्टूबर 2026 की सुबह मुहूर्त में मिट्टी की कलश स्थापना से यह पावन पर्व आरंभ हो चुका है। यह पर्व मुख्य उत्सव के रूप में आश्विन शुक्ल षष्ठी से विजयादशमी की तिथि तक इनके विभिन्न रूपों में 5 दिनों तक पूजित कर 20 अक्टूबर 2026 को इनका अवसान किया जायेगा।
कोलकाता के इस विशेष पर्व में मां दुर्गा को पंडालों, घर और सार्वजनिक स्थानों में इनकी नौ रूपों में अलग-अलग स्वरूपों- प्रथम "शैलपुत्री" से "सिद्धिदात्री" तक के रूपों में पूजा-अर्चना और आरती कर,अष्टमी और नवमी तिथि को हवन, संध्या-आरती और कन्या पूजन के साथ इन्हें विदाई देने का विधान है। फिर अगले दिन विजयदशमी के दसवें दिन विशेषकर कोलकाता में "सिंदूर-खेला" रश्म के साथ मां दुर्गा भवानी को नम आंखों से विदाई देते हुए नदी, तालाबों में प्रतिमा का विसर्जन करते हैं।
मान्यता है कि स्वर्ग से मां भवानी दुर्गा कोलकाता में अवतरित होती है। जब 1757 की प्लासी युद्ध में भीषण मार-काट के बाद जो तबाही कोलकाता में मची थी,उससे पूरे बंगाल की स्थिति काफी भयावह और उथल-पुथल की बन गई थी। तब उन दिनों कोलकाता में पहली बार बड़े साहस के साथ राजबाड़ी के राजा नवकृष्ण देव जी ने इस दूर्गापूजा के त्योहार को एक भव्य धार्मिक उत्सव का रूप देकर मनाया। इस उत्सव में उन्होंने हर जाति और हर धर्म के लोगों के लिए दरवाजे खोल दिए। इस कारण लोगों ने इसमें खुलकर भाग लिया और मानी जाती है कि यहीं से शुरुआत हुई है,कोलकाता में मां दुर्गा की प्रतिमा बनाने का सिलसिला।
मान्यता यह भी है कि कोलकाता की प्रतिमा निर्माण में एक ऐसा रहस्य छुपा है कि कोलकाता की "मां भवानी दुर्गा" की ममता को दुनिया साक्षात रूप में देखती है। यही मान्यता इसे दुनिया में सबसे ऊंचा बना देती है।
मूर्ति निर्माण और विसर्जन की प्रथा भी यहां की अनोखी है।
"मां दुर्गा"की मूर्ति बनाने के लिए गंगा की पवित्र मिट्टी, गाय की गोबर और गोमूत्र इस्तेमाल किया जाता है। लेकिन यह मूर्ति तब तक पूरी नहीं मानी जाती,जबतक की वेश्यालय की यहां से मिट्टी इसमें शामिल नहीं कर ली जाती। इसके लिए एक पुजारी वेश्यालय जाकर वेश्या से मिट्टी मांगता है और वेश्या उन्हें मीट्टी देती है। तब उस मिट्टी को मिलाकर ही मूर्तिकार मूर्ति को अंतिम अंजाम देते हैं।
इसके पीछे के रहस्य की मान्यता यह है कि जब इंसान वेश्यालय का चौखट पार करता है, तो वह अपनी सभी अच्छाई और पवित्रता को वहीं छोड़ जाता है। उसी पवित्रता को मानकर मां की मूर्ति गढ़ी जाती है। यह "रश्म" यह कहती है कि दुनिया जिसे ठुकरा दे "मां" उसे अपने सीने से लगा लेती है।
इतना ही नहीं मां की मूर्तियां महीनों से गढ़ी जाती हैं, किन्तु मां की आंखें तबतक नहीं बनायी जाती, जबतक कि "महालया"का पवित्र दिवस नहीं आ जाता। इस "रश्म" को "चक्षुदान" कहते हैं। इस कार्य को करने के लिए बड़ी भक्ति भाव से कारीगर अपने को दिन भर उपवास रहकर मां की आंखों को पेंट करता है। अतः ऐसी मान्यता है कि इसी पल उस प्रतिमा में "प्राण" आते हैं और वह साक्षात "ब्रह्माण्ड" की "देवी" बन जाती है।
जब "दूर्गापूजा" की "दशमी" के दिन "सिन्दूर खेला" यानी विसर्जन का दिन आता है, तो उस क्षण सबों की आंखें नम हो जाती है और मां को बड़े गहरे मन से लोग विदाई देते हैं।

Guest Writer
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद




