धर्म का मूल आधार सत्कर्म, सद्विचार और परोपकार है
पूजा-पाठ, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा और धार्मिक परंपराओं का अपना महत्व है। ये मनुष्य की आस्था को अभिव्यक्त करने और आत्मिक अनुशासन विकसित करने के माध्यम हो सकते हैं। किंतु इनका वास्तविक महत्व तभी सार्थक होता है, जब इनके प्रभाव से व्यक्ति के विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे।

मनुष्य के जीवन में धर्म का स्थान अत्यंत महत्वपूर्ण है। धर्म केवल आस्था का विषय नहीं, बल्कि जीवन को सही दिशा देने वाला नैतिक आधार भी है। यह मनुष्य को सत्य और असत्य, उचित और अनुचित, न्याय और अन्याय के बीच अंतर करना सिखाता है। धर्म का वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर ऐसी चेतना का विकास करना है, जिससे वह अपने आचरण को शुद्ध करे, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करे और समाज के प्रति अपने दायित्वों को समझे। इस दृष्टि से देखा जाए तो सत्कर्म और सद्विचारों को धारण करना ही धर्म का मूल स्वरूप है।
धर्म केवल पूजा-पाठ, कर्मकांड, तीर्थयात्रा और धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित नहीं है। धर्म का वास्तविक अर्थ है, मनुष्य के विचारों में पवित्रता, आचरण में नैतिकता, व्यवहार में विनम्रता और कर्मों में परोपकार का भाव होना। पूजा का महत्व अपनी जगह है, प्रार्थना का महत्व अपनी जगह है, लेकिन इनका वास्तविक उद्देश्य मनुष्य के भीतर सद्भाव, संयम और सदाचार को विकसित करना है।
जो व्यक्ति सत्य का मार्ग अपनाता है, दूसरों के दुख को समझता है, अपने कर्तव्यों का ईमानदारी से निर्वहन करता है और किसी के अहित की कामना नहीं करता, वही वास्तव में धर्म के मार्ग पर चलता है। सद्विचार मनुष्य के भीतर धर्म का बीज बोते हैं और सत्कर्म उस बीज को फलदार वृक्ष बनाते हैं। केवल धर्म की बातें करना पर्याप्त नहीं है, धर्म को अपने जीवन में उतारना आवश्यक है।
यदि कोई व्यक्ति मंदिर में सिर झुकाता है, लेकिन बाहर निकलकर किसी निर्बल का अपमान करता है, किसी जरूरतमंद का शोषण करता है या अपने स्वार्थ के लिए दूसरों को कष्ट पहुंचाता है, तो उसके धार्मिक आचरण की सार्थकता पर प्रश्न उठना स्वाभाविक है। आज धर्म के स्वरूप को लेकर समाज में अनेक प्रकार की धारणाएं दिखाई देती हैं। कहीं धर्म को धार्मिक अनुष्ठानों तक सीमित कर दिया जाता है, तो कहीं उसकी पहचान बाहरी प्रतीकों, वेशभूषा और सार्वजनिक प्रदर्शन से निर्धारित होने लगती है।
पूजा-पाठ, व्रत, उपवास, तीर्थयात्रा और धार्मिक परंपराओं का अपना महत्व है। ये मनुष्य की आस्था को अभिव्यक्त करने और आत्मिक अनुशासन विकसित करने के माध्यम हो सकते हैं। किंतु इनका वास्तविक महत्व तभी सार्थक होता है, जब इनके प्रभाव से व्यक्ति के विचारों और व्यवहार में सकारात्मक परिवर्तन दिखाई दे।
यदि कोई व्यक्ति नियमित रूप से पूजा करता है, लेकिन व्यवहार में छल-कपट करता है, दूसरों के अधिकारों का हनन करता है, निर्बल का शोषण करता है और अपने स्वार्थ के लिए असत्य का सहारा लेता है, तो उसके धार्मिक आचरण और नैतिक व्यवहार के बीच विरोधाभास स्पष्ट दिखाई देता है। धर्म का मूल्यांकन केवल इस आधार पर नहीं किया जा सकता कि व्यक्ति कितनी बार मंदिर जाता है या कितने धार्मिक अनुष्ठान करता है। यह भी देखना आवश्यक है कि उसके आचरण से परिवार, समाज और मानवता को क्या प्राप्त हो रहा है।
सद्गति का अर्थ भी केवल मृत्यु के बाद मोक्ष या स्वर्ग की प्राप्ति की कामना करना नहीं है। इसका एक गहरा व्यावहारिक अर्थ यह भी है कि मनुष्य अपने जीवन को ऐसे मार्ग पर ले जाए, जहां उसके भीतर विवेक, करुणा, सत्यनिष्ठा और आत्मसंयम का विकास हो। जो अपने मन के विकारों पर विजय प्राप्त करता है, लोभ और अहंकार से बचता है तथा दूसरों के प्रति सद्भाव रखता है, वह अपने जीवन को श्रेष्ठ दिशा प्रदान करता है।
वास्तव में धर्म वह नहीं, जिसे हम केवल मानते हैं। धर्म वह है, जिसे हम अपने विचारों और कर्मों में जीते हैं। इसलिए धर्म की शुरुआत पहले मनुष्य के अंतःकरण से होती है। जब विचार शुद्ध होते हैं, तो वाणी में मधुरता आती है, जब वाणी शुद्ध होती है, तो व्यवहार में विनम्रता आती है और जब व्यवहार शुद्ध होता है, तो कर्म लोककल्याण का माध्यम बन जाते हैं।
सद्विचार आपके मन को पवित्र बनाते हैं, सत्कर्म आपके जीवन को सार्थक बनाते हैं और सदाचार आपको सच्चे अर्थों में धार्मिक बनाता है। अंततः सद्गति की आकांक्षा रखने वाले मनुष्य को सद्विचारों को अपनाना, सत्कर्मों को जीवन का आधार बनाना और सत्य, करुणा तथा न्याय के मार्ग पर चलना चाहिए। यही धर्म का सार है, यही मानवता की पहचान है और यही एक श्रेष्ठ समाज के निर्माण का आधार है।
Guest Author
आचार्य डॉ. विक्रमादित्य
पीठाधीश्वर (पीताम्बरा शक्तिपीठ), धर्मगुरू एवं विचारक




