कर्ज लेकर पिंडदान, तर्पण व श्राद्ध कार्यक्रम संपन्न करना वर्जित है
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार, जीवित बड़ा पुत्र अथवा बड़ा भाई के रहते छोटे पुत्र या छोटे भाई को अपने पूर्वजों का पिंडदान करना वर्जित है। वहीं अगर परिवार में कोई पुरुष सदस्य जीवित नहीं है, तो कोई महिला अपने पुरुषों का पिंडदान कर सकती है।

हिंदू धर्म शास्त्र और पुराणों के अनुसार, संन्यासियों और असाधारण,अश्वभाविक अथवा बालमृत्यु के मामले में पिंडदान (कुछ विशेष परिस्थितियों को छोड़कर) करने का विधान नहीं है। संन्यासी जिन्होंने घर-बार छोड़कर संन्यास धारण कर लिया हो और सांसारिक मोह माया से भी विरक्त हो गया हो, उनका पिंडदान किसी भी सूरत से नहीं किया जा सकता है।
हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार, जीवित बड़ा पुत्र अथवा बड़ा भाई के रहते छोटे पुत्र या छोटे भाई को अपने पूर्वजों का पिंडदान करना वर्जित है। वहीं अगर परिवार में कोई पुरुष सदस्य जीवित नहीं है, तो कोई महिला अपने पुरुषों का पिंडदान कर सकती है।
किसी भी प्राणी की मृत्यु के तुरंत बाद या प्रथम वर्ष की "बरसी" यानी वार्षिक श्राद्ध पूरी होने से पहले गया जी में जाकर अंतिम "गया श्राद्ध" अथवा "पिंडदान" नहीं किया जा सकता है। इतना ही नहीं शास्त्रों में कर्ज लेकर पिंडदान, तर्पण व श्राद्ध कार्यक्रम संपन्न करना वर्जित है ।
उसी प्रकार किसी प्राणी की मृत्यु के बाद उसकी बरसी से पहले यदि उसके परिवार में किसी प्रियजन की मृत्यु हो गई हो तो उस वर्ष के भीतर पिंडदान करने से मना किया गया है।
वहीं फिर यदि मां जीवित है तो अपने पूर्वजों में पिता, दादा,नाना आदि का पिंडदान किया जा सकता है, किंतु जीवित माता का पिंडदान नहीं किया जा सकता है। हिंदू धर्म शास्त्र के अनुसार किसी भी जीवित व्यक्ति का माता या पिता ही क्यों ना हो उनका पिंडदान अथवा श्राद्ध नहीं किया जा सकता। यदि पिता का निधन हो गया हो और माता जीवित हैं, तो आप अपने पिता का श्राद्ध और पिंडदान कर सकते हैं, किंतु इस दौरान जीवित माता की अनुमति लेना आवश्यक होता है।

Guest Writer
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद



