पूर्वजों के प्रति आस्था का प्रतीक है श्राद्ध कर्म की परंपरा
ऐसी मान्यता है कि गया जी धाम एकमात्र पितृ तीर्थ है,जहां तर्पण के माध्यम से पितरों को जल अर्पित कर उन्हें तृप्त किया जाता है। इसके बदले में पितर उन्हें सुफल और आशीर्वाद देकर उनके संपूर्ण परिवार के सुखमय जीवन की कामना करते हैं। गया जी तीर्थ स्थल में पिंडदान व श्राद्ध कर्म संपन्न करने संबंधी विवरण अनेक धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से मिलती है। यथा- वायु पुराण, गरुड़ पुराण, नारद पुराण,रामायण, महाभारत आदि।

पिंडदान की परंपरा अति प्राचीन काल से चली आ रही है, जिसे देश के विभिन्न स्थानों में श्राद्ध कर्म की क्रिया संपन्न की जाती है। इस क्रिया को संपन्न करने के लिए गया जी, प्रयागराज और ऋषिकेश का विशेष महत्व माना गया है। किंतु इन तीनों तीर्थों में गया जी को ही श्राद्ध कर्म के लिए सर्वश्रेष्ठ माना गया है। यही कारण है कि यहां प्रत्येक वर्ष भाद्रपद पूर्णिमा से आश्विन अमावस्या तक के बीच गया जी में भव्य पितृपक्ष मेले का आयोजन होता है,जिसमें देश-विदेश के लाखों पिंडदानी गया जी आकर अपने पूर्वजों के लिए पिंडदान व तर्पण नियम पूर्वक करते हैं।
पिंडदानी अपने पूर्वजों को इस भवसागर में आवागमन से मुक्ति दिलाने का कार्य गया जी आकर पिंडदान और तर्पण के माध्यम से करते हैं। ऐसी मान्यता है कि गया जी में पिंडदान और तर्पण करने से प्राणी के आठ कुलों के सात गोत्रों का उद्धार हो जाता है और उन्हें बैकुंठ लोक, स्वर्ग लोक व विष्णु लोक अथवा (हेवेन-Heaven) की प्राप्ति होती है और उन्हें मोक्ष मिल जाता है।
यही कारण है कि इधर कुछ वर्षों से विदेशी मेहमान भी बड़ी संख्या में पिंडदान करने के लिए भारतवर्ष के पवित्र गया जी धाम में आना प्रारंभ कर दिया है। इस वर्ष तो रुस,जर्मनीऔर इटली से २२ की संख्या में विदेशी मेहमान गया जी आकर अपने दिवंगत पूर्वजों के प्रति पिंडदान और तर्पण कार्य को बड़े ही श्रद्धा पूर्वक मनोभाव से संपन्न किया। वे सभी विदेशी मेहमानविष्णुपद,सोलहवेदी,देवघाट,फल्गु ,प्रेतशिला,राम कुंड,काकबली, उत्तर मानस,कनखल, सीता कुंड आदि प्रमुख वेदियों पर पिंडदान श्राद्ध कर्म को संपन्न किया।
ऐसी मान्यता है कि गया जी धाम एकमात्र पितृ तीर्थ है,जहां तर्पण के माध्यम से पितरों को जल अर्पित कर उन्हें तृप्त किया जाता है। इसके बदले में पितर उन्हें सुफल और आशीर्वाद देकर उनके संपूर्ण परिवार के सुखमय जीवन की कामना करते हैं। गया जी तीर्थ स्थल में पिंडदान व श्राद्ध कर्म संपन्न करने संबंधी विवरण अनेक धार्मिक ग्रंथों में विस्तार से मिलती है। यथा- वायु पुराण, गरुड़ पुराण, नारद पुराण,रामायण, महाभारत आदि।
सीता कुंड में पिंडदानियों ने बालू के पिंड से तर्पण और पिंडदान किया। पौराणिक मान्यता है कि माता सीता ने फल्गु नदी की रेत से अपने ससुर दशरथ जी का पिंडदान बालू के पिंड से ही किया था, जो परंपरा आज तक कायम है। पितृ पक्ष के नौंवे दिन बड़ी संख्या में पिंडदानियों ने फल्गु नदी की रेत से पिंड बनाकर अपने पितरों को पिंड अर्पित किया। कर्मकांड के दौरान पिंडदानियों के पुरोहितों ने मंत्रोच्चारण से पूरे क्षेत्र को भक्तिमय बना दिया। पिंडदानियों ने तर्पण के साथ पितरों के मोक्ष और परिवार के सुख-समृद्धि और शांति की कामना की। पितृपक्ष का यह अंतिम चरण है। 10 अक्टूबर को इसका समापन होगा।
सीता कुंड में पिंडदान की शुरुआत फल्गु नदी के जल से तर्पण के साथ की जाती है। इसके बाद फल्गु की रेत से पिंड तैयार कर नामित पितरों को पिंड अर्पित किया जाता है। कर्मकांड पूरा होने पर पिंड फल्गु नदी में प्रवाहित कर दिया जाता है। माता सीता ने रेत से चुंकि अपने ससुर को पिंडदान किया था, इस कारण आज भी वह परंपरा चली आ रही है।
ऐसी धार्मिक मान्यता है कि जब भगवान श्री राम अपने पिता राजा दशरथ के मोक्ष की कामना लेकर गया जी पधारे थे,तो पिंडदान की सामग्री लाने के लिए श्री राम बाजार चले गए थे,इसी बीच राजा दशरथ ने अपना हाथ सीता के सामने प्रकट किया और पिंडदान करने को कहा। सीता बोली कि आपको पिंड देने के लिए सामग्री लाने अपने बाजार गये हैं।वे अब आते ही होंगे। उनके इंतजार में मैं बैठी हूं। तब उनके ससुर ने कहा कि बहू! सही मुहूर्त का समय निकलता जा रहा है,बहू! तुम फल्गु नदी की रेत यानी बालु से ही पिंड बनाकर मुझे दे दो। इसी मान्यता के कारण सीता कुंड में आज भी बालू के पिंड से ही पिंडदान की परंपरा चली चली आ रही है। यह भी मान्यता है कि फल्गु नदी के स्पर्श मात्र से पितरों को मोक्ष की प्राप्ति होती है।

Guest Writer
डॉ.शत्रुघ्न डांगी
इतिहासकार एवं पुरातत्वविद

