सीजेपी आंदोलन का बदलता स्वरूप: सरकारी संस्थानों पर अराजक भीड़ का दबाव बनाने की रणनीति
क्या यह आंदोलन बेरोजगारी, शिक्षा और लोकतांत्रिक जवाबदेही जैसे वास्तविक मुद्दों को उठाने वाला युवा प्रतिरोध है, या इसकी राजनीति धीरे-धीरे टकराव, प्रतीकात्मक उग्रता और संस्थाओं पर दबाव बनाने की रणनीति की ओर बढ़ रही है?

राजनीतिक आंदोलन प्रायः सरकार और संस्थाओं से जवाबदेही मांगते हैं। लेकिन जवाबदेही की मांग करने वाले संगठनों को भी अपने दावों, संसाधनों, नेतृत्व और कार्यप्रणाली के संबंध में पारदर्शी होना चाहिए। सीजेपी के संस्थापक अभिजीत दीपके का आंदोलन बेरोजगार युवाओं के प्रति कथित अपमानजनक टिप्पणी से उपजे ऑनलाइन प्रतिरोध से आगे बढ़कर चुनावी प्रक्रिया और मुख्य निर्वाचन आयुक्त ज्ञानेश कुमार के इस्तीफे की मांग तक पहुंचा है।
यदि किसी संगठन का दावा है कि वह लोकतंत्र की रक्षा के लिए संघर्ष कर रहा है, तो उसे असहमति के अधिकार को अपने समर्थकों के साथ-साथ विरोधियों के लिए भी स्वीकार करना होगा। यदि वह पारदर्शिता की मांग करता है, तो उसकी अपनी कार्यप्रणाली भी जांच और सवालों के लिए खुली होनी चाहिए।
लोकतंत्र में जवाबदेही एकतरफा व्यवस्था नहीं है। यह सत्ता, संस्थाओं, राजनीतिक दलों और जन आंदोलनों, सभी पर लागू होती है।
भारतीय राजनीति में आंदोलनों का इतिहास केवल सत्ता परिवर्तन का इतिहास नहीं है। यह उन सामाजिक अंतर्विरोधों का भी इतिहास है, जिनसे कभी नए राजनीतिक विचार जन्म लेते हैं।
कभी व्यवस्था में सुधार की मांग उठती है और कभी स्थापित संस्थाओं की वैधता पर ही सवाल खड़े होने लगते हैं। कॉक्रोच जनता पार्टी का उभार इसी व्यापक संदर्भ में देखने की जरूरत है। बेरोजगार युवाओं को कॉक्रोच कहे जाने से जुड़ी टिप्पणी के बाद अभिजीत दीपके की सोशल मीडिया पोस्ट ने इस नाम को आंदोलन की पहचान बना दिया। धीरे-धीरे बेरोजगारी, शिक्षा, युवाओं की उपेक्षा और सरकारी जवाबदेही इसके राजनीतिक विमर्श के प्रमुख मुद्दे बन गए।
इस घटनाक्रम का एक महत्वपूर्ण पहलू है। जिस संबोधन को अपमान के रूप में देखा गया, उसे आंदोलन ने अपनी सामूहिक पहचान में बदल दिया। यह डिजिटल राजनीति की एक ऐसी रणनीति है जिसमें व्यंग्य, मीम और आक्रामक प्रतीक पारंपरिक राजनीतिक भाषणों की जगह लेते हैं। लेकिन किसी आंदोलन की शुरुआत जितनी प्रतीकात्मक हो सकती है, उसका आगे का रास्ता उतना ही गंभीर राजनीतिक प्रश्नों से जुड़ जाता है।
भारत में युवाओं की बेरोजगारी, प्रतियोगी परीक्षाओं में अनियमितताओं की शिकायतें, भर्ती प्रक्रियाओं में देरी और शिक्षा की गुणवत्ता जैसे प्रश्न किसी एक राजनीतिक दल की सीमाओं में नहीं बंधे हैं। इनका प्रभाव लाखों परिवारों की आर्थिक सुरक्षा, सामाजिक प्रतिष्ठा और भविष्य की योजनाओं पर पड़ता है।
जब शिक्षित युवा वर्षों तक नौकरी की प्रतीक्षा करता है, परीक्षा की तैयारी में परिवार की बचत खर्च करता है और अंततः अनिश्चितता से घिर जाता है, तब उसका असंतोष केवल व्यक्तिगत निराशा नहीं रहता। वह व्यवस्था से जवाब मांगने लगता है। सीजेपी ने इसी असंतोष को एक राजनीतिक पहचान देने की कोशिश की है। उसके आंदोलन से जुड़े सार्वजनिक विमर्श में शिक्षा, रोजगार, चुनावी पारदर्शिता और संस्थागत जवाबदेही जैसे विषय शामिल हैं। लेकिन यहां एक बुनियादी अंतर समझना आवश्यक है। किसी समस्या को प्रभावशाली ढंग से उठाना और उसका समाधान प्रस्तुत करना दो अलग-अलग राजनीतिक क्षमताएं हैं।
आक्रोश किसी आंदोलन को जन्म दे सकता है, लेकिन वह अपने आप नीतिगत कार्यक्रम नहीं बन जाता। बेरोजगारी का समाधान रोजगार सृजन, कौशल विकास, औद्योगिक निवेश, पारदर्शी भर्ती और शिक्षा की गुणवत्ता सुधारने जैसी ठोस नीतियों से जुड़ा है। इसी प्रकार, चुनावी प्रक्रिया पर सवाल उठाने के लिए प्रमाण, कानूनी प्रक्रियाओं और स्वतंत्र जांच की मांग महत्वपूर्ण है।

Editor
अजय गौतम
पिछले ढ़ाई दशकों से पत्रकारिता और लेखन मेरे जीवन का हिस्सा रहा है। भले ही आपके जीवन का लक्ष्य कुछ और हो, लेकिन नियति जो चाहती है वही होता हैै।
